झारखंड बजट 2026: क्या सच में विकास की दिशा स्पष्ट है?
झारखंड बजट 2026 को लेकर राज्य की जनता, खासकर युवा, किसान, महिलाएं और कर्मचारी वर्ग, बड़ी उम्मीदों के साथ इंतजार कर रहे थे। लेकिन प्रस्तुत दस्तावेज़ को देखने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बजट वास्तव में राज्य के दीर्घकालिक विकास की ठोस रूपरेखा प्रस्तुत करता है या फिर यह केवल आंकड़ों की प्रस्तुति तक सीमित रह गया है। राज्य की मौजूदा सरकार—Hemant Soren के नेतृत्व वाली Jharkhand Mukti Morcha, Indian National Congress और Rashtriya Janata Dal गठबंधन—ने इस बजट को विकासोन्मुखी बताया है, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और संकेत देती है।
राजस्व सृजन की स्पष्ट रणनीति का अभाव
किसी भी राज्य का बजट उसकी आर्थिक सेहत और भविष्य की दिशा तय करता है। इस बजट में राजस्व बढ़ाने के लिए कोई स्पष्ट और अभिनव रणनीति सामने नहीं आई।
- क्या नए उद्योगों को आकर्षित करने के लिए ठोस प्रोत्साहन नीति है?
- क्या निवेश बढ़ाने हेतु कर सुधार या संरचनात्मक बदलाव प्रस्तावित हैं?
इन सवालों का स्पष्ट उत्तर बजट दस्तावेज़ में नहीं मिलता। इससे वित्तीय प्रबंधन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं।
बेरोजगार युवाओं के लिए ठोस पहल का अभाव
झारखंड में बेरोजगारी एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
- नए सरकारी पदों की स्पष्ट भर्ती योजना नहीं
- कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार सीमित
- स्टार्टअप और स्वरोजगार को लेकर ठोस आर्थिक पैकेज का अभाव
युवा सशक्तिकरण के बड़े दावों के बावजूद, बजट में रोजगार सृजन के लिए स्पष्ट रोडमैप दिखाई नहीं देता। छात्रों के लिए न नई छात्रवृत्ति की व्यापक घोषणा है और न ही उच्च शिक्षा में अवसरों के विस्तार की स्पष्ट नीति।
अनुबंधकर्मियों और कर्मचारियों की अनदेखी
राज्य में बड़ी संख्या में अनुबंधकर्मी कार्यरत हैं, जो लंबे समय से नियमितीकरण और वेतन संरचना में सुधार की मांग कर रहे हैं। बजट में इस विषय पर कोई ठोस घोषणा न होना, कर्मचारियों में असंतोष बढ़ा सकता है। यह वर्ग राज्य की प्रशासनिक रीढ़ माना जाता है, लेकिन उनके भविष्य को लेकर स्पष्टता का अभाव चिंताजनक है।
किसानों के लिए सीमित राहत
झारखंड की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है।
- फसल बीमा योजनाओं का विस्तार?
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर स्पष्ट नीति?
- सिंचाई और कृषि अधोसंरचना में निवेश?
इन बिंदुओं पर बजट में अपेक्षित मजबूती नहीं दिखती। किसानों को दीर्घकालिक स्थिरता देने वाली योजनाओं की जगह अल्पकालिक प्रावधानों पर जोर अधिक प्रतीत होता है।
महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुरक्षा
महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए स्वरोजगार, स्वयं सहायता समूह (SHG) और उद्यमिता को बढ़ावा देने वाली योजनाओं का व्यापक विस्तार अपेक्षित था। वृद्ध और दिव्यांगजन की पेंशन में भी कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं की गई, जिससे सामाजिक सुरक्षा तंत्र की मजबूती पर सवाल उठते हैं।
क्या यह केवल आंकड़ों का खेल है?
बजट भाषण में बड़े-बड़े आंकड़े और योजनाओं की घोषणाएं जरूर हैं, लेकिन:
- क्या इन योजनाओं के क्रियान्वयन की समय-सीमा स्पष्ट है?
- क्या पारदर्शी निगरानी तंत्र की व्यवस्था है?
- क्या पिछली घोषणाओं की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की गई?
यदि जवाब अस्पष्ट है, तो जनता इसे केवल “आंकड़ों की बाजीगरी” ही मानेगी।













